इंसान और दुनिया

खुला बाजार ये कैसायहाँ मजहब भी है बिकता,कि बिकता है इंसान यहाँऔर हर रब भी है बिकता ।
न जाने कैसी दुनिया हैकि अब ईमान नहीं टिकता,मुझे हिन्दू भी दिखता हैमुझे मुस्लिम भी दिखता है,मगर अफ़सोस कि बन्दाखुदा का अब नहीं दिखता।कि बिकता है इंसान यहाँऔर हर रब भी है बिकता ।
है पैसों से नाम, शोहरतकि है औकात पैसों से,कि जिससे होती हैइज्जत बूढ़े बुजुर्गों कीशर्म आती है मुझको कीअब वो सलाम नहीं दिखता।कि बिकता है इंसान यहाँऔर हर रब भी है बिकता ।
हो अपनापन यहाँ जिसमेंवो रिश्ता अब नहीं दिखतादिखते हैं लुटेरे हर तरफइरादे नापाक हैं जिनकेबचाने सामने आयेफरिश्ता अब नहीं दीखताकि बिकता है इंसान यहाँऔर हर रब भी है बिकता ।
खुला बाजार ये कैसायहाँ मजहब भी बिकता है,कि बिकता है इंसान यहाँऔर हर रब भी है बिकता 

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