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इंसान और दुनिया

खुला बाजार ये कैसा यहाँ मजहब भी है बिकता, कि बिकता है इंसान यहाँ और हर रब भी है बिकता । न जाने कैसी दुनिया है कि अब ईमान नहीं टिकता, मुझे हिन्दू भी दिखता है मुझे मुस्लिम भी दिखता है, मगर अफ़सोस कि बन्दा खुदा का अब नहीं दिखता। कि बिकता है इंसान यहाँ और हर रब भी है बिकता । है पैसों से नाम, शोहरत कि है औकात पैसों से, कि जिससे होती है इज्जत बूढ़े बुजुर्गों की शर्म आती है मुझको की अब वो सलाम नहीं दिखता। कि बिकता है इंसान यहाँ और हर रब भी है बिकता । हो अपनापन यहाँ जिसमें वो रिश्ता अब नहीं दिखता दिखते हैं लुटेरे हर तरफ इरादे नापाक हैं जिनके बचाने सामने आये फरिश्ता अब नहीं दीखता कि बिकता है इंसान यहाँ और हर रब भी है बिकता । खुला बाजार ये कैसा यहाँ मजहब भी बिकता है, कि बिकता है इंसान यहाँ और हर रब भी है बिकता  

बचपन हमारा सब से प्यारा

शाम ढले आसमान के तले मैं आँखें मूँद के बैठा हूँ, फुर्सत के कुछ लम्हों में बचपन को ढूँढने बैठा हूँ। हैं गम भी बहुत परेशानियाँ भी हैं वक़्त की दी हुयी निशानियाँ भी हैं, और साथ में हैं दर्द कई उन सब को भूलने बैठा हूँ फुर्सत के कुछ लम्हों में बचपन को ढूँढने बैठा हूँ। कभी खुले असमान के नीचे गलियों में दौड़ जब लगती थी माँ-पापा प्यार बहुत करते डांट कभी-कभी पड़ती थी, उन्हीं बीते पलों को आज मैं फिर से टटोलने बैठा हूँ फुर्सत के कुछ लम्हों में बचपन को ढूँढने बैठा हूँ। वो लाइट का आना-जाना मिलकर सबका शोर मचाना रात को पढना लालटेन में भोर भये से फिरे उठ जाना, गाँव के विद्यालय जाती उस पगडण्डी पर घूमने बैठा हूँ फुर्सत के कुछ लम्हों में बचपन को ढूँढने बैठा हूँ। फिर टन-टन घंटी बजती थी दौड़ के घर सब जाते थे खेलते थे बच्चे जब शाम को बड़े बुजुर्ग चौपाल सजाते थे, मंदिर में होती आरती और रामायण सुनने बैठा हूँ फुर्सत के कुछ लम्हों में बचपन को ढूँढने बैठा हूँ। आज कहाँ वो गलियां हैं कहाँ रहे वो चौबारे कहाँ गये वो साथी जो हर शाम हमको जो पुकारे, याद जो आये उन किस्सों को आज मैं बुनने बैठा हूँ फ...

पैसा

खुला बाजार ये कैसा यहाँ मजहब भी है बिकता, कि बिकता है इंसान यहाँ और हर रब भी है बिकता । न जाने कैसी दुनिया है कि अब ईमान नहीं टिकता, मुझे हिन्दू भी दिखता है मुझे मुस्लिम भी दिख...